https://www.thehealthjournal.co.in THE HEALTH JOURNAL written and designed by VIJAY K KASHYAP

जौ (Barley): आयुर्वेद का 'सुपरफूड' और आपकी सेहत का वरदान

चित्र
​ जौ (Barley): आयुर्वेद का 'सुपरफूड' और आपकी सेहत का वरदान ​ आज के दौर में जब हम नई-नई बीमारियों से घिरे हैं, तब आयुर्वेद की ओर लौटना ही समझदारी है। आयुर्वेद में 'यव' यानी जौ को केवल एक अनाज नहीं, बल्कि एक दिव्य औषधि माना गया है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसके असाधारण औषधीय गुणों का वर्णन है।  ​1. मधुमेह (Diabetes) में रामबाण ​आज भारत को 'वर्ल्ड डायबिटीज कैपिटल' कहा जा रहा है। आयुर्वेद में जौ को 'यव प्रधानस्तु भवेत प्रमेह' कहकर प्रमेह (डायबिटीज सहित 20 प्रकार के रोग) का प्रमुख आहार बताया गया है। ​ कैसे काम करता है: जौ में बीटा-ग्लूकन (Beta-glucan) नामक सॉल्युबल फाइबर होता है, जो शरीर में कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण को धीमा कर देता है, जिससे ब्लड शुगर में अचानक उछाल (Sugar Spike) नहीं आता। ​ उपयोग: मधुमेह के रोगी जौ के सत्तू या जौ की रोटी को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं। ​2. यूरिन और किडनी स्वास्थ्य (Urinary & Kidney Health) ​किडनी स्टोन, यूटीआई (UTI), और बार-बार यूरिन आने जैसी समस्याओं में जौ अत्यंत लाभकारी है। ​ ...

गर्मी और सर्दी की संवेदनशीलता का स्वास्थ्य पर प्रभाव : जानिए बचाव के उपाय


र्मी और सर्दी की संवेदनशीलता का स्वास्थ्य पर प्रभाव : जानिए बचाव के सरल उपाय 


🌡️हमारे शरीर का तापमान सामान्यतः लगभग 98.4°F (37°C) के आसपास रहता है। लेकिन जब बाहरी तापमान — चाहे वह अधिक गर्मी हो या अधिक ठंड — शरीर के इस संतुलन को प्रभावित करता है, तब हम ‘संवेदनशीलता’ महसूस करते हैं। कुछ लोग सर्दी लगते ही कांपने लगते हैं, जबकि कुछ को हल्की गर्मी में ही बेचैनी, सिरदर्द या थकान महसूस होती है। यह स्थिति शरीर की थर्मो-रेगुलेटरी प्रणाली (Temperature controlling mechanism) के असंतुलन का परिणाम होती है।


गर्मी की संवेदनशीलता (Heat Sensitivity)

गर्मी के मौसम में शरीर पसीने के माध्यम से अपने तापमान को नियंत्रित करता है। लेकिन जब यह प्रक्रिया बाधित होती है, तो शरीर में हीट इंटोलरेंस या गर्मी की असहनीयता उत्पन्न होती है।

गर्मी की संवेदनशीलता के लक्षण :

  • हल्की या अधिक थकान
  • सिरदर्द, चक्कर आना
  • पसीना अधिक या कम आना
  • त्वचा का लाल होना या जलन
  • नींद न लगना, बेचैनी

आयुर्वेदिक कारण :

आयुर्वेद के अनुसार गर्मी की संवेदनशीलता पित्त दोष के बढ़ने से होती है। पित्त बढ़ने पर शरीर में गर्मी, जलन, और क्रोध जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं।

गर्मी से बचाव के उपाय :

  1. शीतल पेय का सेवन करें — गिलोय, आमलकी, बेल, और शरबत युक्त पानी लाभकारी हैं।
  2. कपास के हल्के वस्त्र पहनें।
  3. नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी नियमित लें।
  4. सूर्य की सीधी धूप से बचें, विशेषकर 11 बजे से 3 बजे तक।
  5. ठंडी तासीर वाले आहार लें – जैसे खीरा, तरबूज, लौकी, कद्दू।
  6. तुलसी और गिलोय रस से पित्त का संतुलन बनाए रखें।


सर्दी की संवेदनशीलता (Cold Sensitivity)

कुछ लोगों को हल्की ठंड में ही हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं या उन्हें कंपकंपी होने लगती है। यह स्थिति वात दोष के असंतुलन या रक्त संचार की कमजोरी से जुड़ी होती है।

सर्दी की संवेदनशीलता के लक्षण :

  • हाथ-पैर ठंडे रहना
  • जोड़ों में जकड़न या दर्द
  • खांसी, जुकाम या गले में खराश
  • त्वचा का रूखापन
  • नींद में कठिनाई

आयुर्वेदिक कारण :

सर्दी की संवेदनशीलता वात और कफ दोष के असंतुलन से होती है। यह असंतुलन रक्तप्रवाह को धीमा कर देता है, जिससे शरीर के सिरे (extremities) में ठंडक अधिक महसूस होती है।

सर्दी से बचाव के उपाय :

  1. गुनगुने तेल से मालिश (Abhyanga) करें — तिल, सरसों या नारियल तेल में थोड़ा कपूर मिलाकर।
  2. गुनगुना पानी पीएं और ठंडे पेय से बचें।
  3. सूप, अदरक चाय, काली मिर्च, लौंग का सेवन करें।
  4. धूप सेंकें — सुबह की हल्की धूप शरीर को ऊष्मा और विटामिन D देती है।
  5. गर्म वस्त्र पहनें, विशेषकर सिर और पैरों को ढकें।
  6. योग और प्राणायाम करें – विशेषकर सूर्य भेदन प्राणायाम, जिससे पिंगला नाड़ी (ऊष्मा देने वाली) सक्रिय होती है।


संवेदनशीलता कम करने के समग्र उपाय :

  1. शरीर का ताप संतुलन बनाए रखना सीखें।

    • 1ठंड में हल्की कसरत करें, गर्मी में गहरी सांस लेकर ठंडक महसूस करें।

    • 2नियमित योगासन करें — ताड़ासन, पश्चिमोत्तानासन, भुजंगासन, और शवासन ताप संतुलन में मदद करते हैं।
    • 3नियमित नींद और जागरण का समय एक समान रखें।
    • 4तनाव न बढ़ाएं — क्योंकि मानसिक तनाव भी शरीर के ताप संतुलन को बिगाड़ देता है।
    • 5मौसमी आहार अपनाएं। हर मौसम में स्थानीय और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ सबसे अधिक संतुलनकारी होते हैं।


निष्कर्ष : 

संतुलन ही स्वास्थ्य का मूल है

गर्मी या सर्दी की संवेदनशीलता वास्तव में शरीर के भीतर ऊर्जा संतुलन की कमी का संकेत है। यदि हम अपने शरीर के संकेतों को समझें, अपनी दिनचर्या और आहार को मौसम के अनुसार ढालें, तो न तो ठंड हमें नुकसान पहुंचा सकती है और न ही गर्मी।

आयुर्वेद कहता है – "शरीरं तापमानं च यथाकालं नियच्छति, स एव आरोग्यम् लभते" — अर्थात जो व्यक्ति अपने शरीर का तापमान परिस्थिति अनुसार नियंत्रित रखता है, वही सच्चे अर्थों में स्वस्थ रहता है।

देखने के लिए स्क्रोल करें :

क्या आप जानते हैं कि आपके घर की रसोई ही दुनिया की सबसे बड़ी और सुरक्षित डिस्पेंसरी है?

इन सरल अभ्यासों और रसोई की खानपान से दिमाग को बनायें शार्प

शरीर खुद ही करता है सभी रोगों का इलाज | जानें प्रकृति के अद्भुत रहस्य और प्राकृतिक उपचार

उम्र बढ़ने के साथ शरीर से ज्यादा मन जिम्मेवार है यौन दुर्बलता हेतु : नित्य नाड़ी शोधन कर इच्छा को बलवान बनायें

नीम और हल्दी का सही उपयोग करके टाइप 2 डायबिटीज (शुगर) को कंट्रोल करें – प्राकृतिक और असरदार उपाय

गर्मी के दिनों में चना सत्तू खाने के फायदे - एक संपूर्ण गाइड

अनुशासित मन-मस्तिष्क ही राज है स्वस्थ रहने का

टाईप 2 शुगर से बचाव (Type 2 Sugar prevention) का आसान और बेहतर उपाय

कान दर्द की समस्या: पाएं असरदार आयुर्वेदिक समाधान

गहरी नींद से खुद-ब-खुद ठीक होने लगती हैं ये बीमारियाँ : फायदे जानकर हैरान रह जायेंगे