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जौ (Barley): आयुर्वेद का 'सुपरफूड' और आपकी सेहत का वरदान

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​ जौ (Barley): आयुर्वेद का 'सुपरफूड' और आपकी सेहत का वरदान ​ आज के दौर में जब हम नई-नई बीमारियों से घिरे हैं, तब आयुर्वेद की ओर लौटना ही समझदारी है। आयुर्वेद में 'यव' यानी जौ को केवल एक अनाज नहीं, बल्कि एक दिव्य औषधि माना गया है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसके असाधारण औषधीय गुणों का वर्णन है।  ​1. मधुमेह (Diabetes) में रामबाण ​आज भारत को 'वर्ल्ड डायबिटीज कैपिटल' कहा जा रहा है। आयुर्वेद में जौ को 'यव प्रधानस्तु भवेत प्रमेह' कहकर प्रमेह (डायबिटीज सहित 20 प्रकार के रोग) का प्रमुख आहार बताया गया है। ​ कैसे काम करता है: जौ में बीटा-ग्लूकन (Beta-glucan) नामक सॉल्युबल फाइबर होता है, जो शरीर में कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण को धीमा कर देता है, जिससे ब्लड शुगर में अचानक उछाल (Sugar Spike) नहीं आता। ​ उपयोग: मधुमेह के रोगी जौ के सत्तू या जौ की रोटी को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं। ​2. यूरिन और किडनी स्वास्थ्य (Urinary & Kidney Health) ​किडनी स्टोन, यूटीआई (UTI), और बार-बार यूरिन आने जैसी समस्याओं में जौ अत्यंत लाभकारी है। ​ ...

स्टेमिना और फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने की अद्भुत तकनीक: प्राणायाम एवं कुंभक अभ्यास


स्टेमिना और फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने की अद्भुत तकनीक:
प्राणायाम एवं कुंभक अभ्यास

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शरीर का स्टेमिना बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। यदि आप भी जल्दी थक जाते हैं या आपकी सांस जल्दी फूलती है, तो आयुर्वेद और योग में बताई गई यह विशेष श्वास तकनीक आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह अभ्यास न केवल फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाता है, बल्कि शरीर को नई ऊर्जा से भर देता है।

​अभ्यास की चरण-दर-चरण विधि:

​इस प्रक्रिया को पूरी एकाग्रता और सही क्रम के साथ सिर्फ 2 मिनट तक के लिए ही करना चाहिए जो आवश्यक है - 

1. सही मुद्रा और आसन (Physical Posture)

​किसी भी शांत स्थान पर सुखासन या किसी भी आरामदायक स्थिति में बैठें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी कमर बिल्कुल सीधी होनी चाहिए। रीढ़ की हड्डी सीधी रहने से श्वास नलिका में कोई अवरोध नहीं आता और फेफड़े पूरी तरह फैल पाते हैं।

​2. डायफ्रामिक श्वास तकनीक (Diaphragmatic Breathing)

​यह​ इस अभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण चरण है:

  • इनहेल (Inhale): नाक से गहरी और धीमी गति से सांस अंदर लें। ध्यान रखें कि सांस भरते समय आपका पेट बाहर की ओर फूलना चाहिए (डायफ्राम का उपयोग करें)।

  • एक्सहेल (Exhale): अब मुंह से धीरे-धीरे, एक नियंत्रित गति (Controlled Rhythm) के साथ सांस को बाहर निकालें।

​3. लयबद्धता का महत्व

​इस प्रक्रिया को एक सिस्टमैटिक रिदम (लय) के साथ करें। जितनी देर सांस अंदर लें, उतनी ही या उससे थोड़ी अधिक देर सांस को बाहर निकालने का प्रयास करें। यह निरंतरता आपके नर्वस सिस्टम को शांत करती है।

​4. कुंभक का अभ्यास (Retention of Breath)

​अंत में, इस तकनीक के साथ कुंभक को निम्न बताए विधि के अनुसार 4-5 राउंड अभ्यास को जोड़ें और इसे नियमित रूप से 3 महीने तक सुबह-सुबह खाली पेट करें। लाभ तो पहले दिन से ही महसूस होने लगेगा। 

  • अंतः कुंभक (Antah Kumbhaka): सांस अंदर भरने के बाद उसे कुछ क्षणों के लिए रोकें। फिर सामान्य रूप से छोड़ दें। 

  • वाह्य कुंभक (Bahya Kumbhaka): सांस पूरी तरह बाहर निकालने के बाद, उसे बिना लिए कुछ क्षणों के लिए रुकें। फिर सामान्य तरीके से सांस भरें। 

  • स्वभाविक आदत ( Automoted Habit):इस क्रिया को 4 - 5 राउन्ड दुहराएं। फिर सामान्य रूप से सांस लेना शुरू कर दें। आप देखेंगे कि कुछ ही दिनों में यह क्रिया स्वसंचालित आदत मे बदल जाएगी। 

​इस अभ्यास के लाभ:

  • लंग्स की कैपेसिटी: नियमित अभ्यास से फेफड़ों की ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता (Holding Capacity) कई गुना बढ़ जाती है।

  • स्टेमिना बूस्ट: शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बेहतर होने से सहनशक्ति (Stamina) आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती है।

  • मानसिक शांति: नियंत्रित श्वास से तनाव और चिंता दूर होती है।

​निष्कर्ष:

​मेरे अनुभव में, यह केवल एक श्वास अभ्यास नहीं, बल्कि अपने शरीर को पुनर्जीवित करने की एक कला है। जब हम अपनी श्वास पर नियंत्रण करना सीख लेते हैं, तो हम अनजाने में ही अपने संपूर्ण स्वास्थ्य को नियंत्रित करना सीख जाते हैं। यदि आप इसे प्रतिदिन केवल 10-15 मिनट का समय देते हैं, तो आप स्वयं अपने शरीर में आई स्फूर्ति और ऊर्जा के स्तर में भारी अंतर महसूस करेंगे। याद रखें, निरंतरता ही इस अभ्यास की सफलता की कुंजी है। इसे आज ही से अपने जीवन का हिस्सा बनाएं!

✍️ लेखक : विजय कुमार कश्यप 

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