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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड

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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड ​ आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खान-पान की अनियंत्रित आदतों के कारण पथरी (Stone) एक आम स्वास्थ्य समस्या बन गई है। किडनी, पित्त की थैली (Gall Bladder) या मूत्र मार्ग में होने वाली यह समस्या असहनीय दर्द का कारण बनती है। यदि आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो केवल दवा ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सही खान-पान और सख्त परहेज का पालन करना भी अनिवार्य है। आज के इस लेख में हम होम्योपैथिक दृष्टिकोण और आहार संबंधी आवश्यक सावधानियों पर चर्चा करेंगे। ​ पथरी होने के लक्षण और पहली सावधानी ​ पथरी होने का मुख्य संकेत किडनी के आसपास होने वाला तीव्र दर्द है। यदि सोनोग्राफी या अल्ट्रासाउंड में पथरी की पुष्टि होती है, तो सबसे पहली सावधानी यह बरतें कि कैल्शियम (चूना) का सेवन पूरी तरह बंद कर दें । शरीर में कैल्शियम का सही ढंग से न पचना ही स्टोन बनने का सबसे बड़ा कारण है। ​ पथरी को गलाने के लिए होम्योपैथिक उपाय ​ होम्योपैथी में पथरी को धीरे-धीरे घोलकर बाहर निकालने के लिए दो प्रभावी औषधियाँ सुझाई जाती हैं: ​ बर्बेरिस वल्गेरिस (Berberis Vulgar...

अनुशासित मन-मस्तिष्क ही राज है स्वस्थ रहने का

अनुशासित मन-मस्तिष्क ही राज है स्वस्थ रहने का

शारीरिक स्थिति संतोषजनक रहे, इसके लिए जरूरी है मानसिक स्थिति भी तदनुसार हो। पौराणिक ग्रंथों में शरीर को सामान्यतः तीन भागों में बांटा गया है:

  • स्थूल शरीर
  • सूक्ष्म शरीर – यह बीच वाला सूक्ष्म शरीर ही हमारा मन है।
  • कारण शरीर – इसे आत्मा कहा गया है जो आध्यात्म से जुड़ा विषय है।

मन अपनी चंचलता और शैतानी दिखाने के लिए प्रसिद्ध है। कब, कहां और कैसे क्या करा बैठेगा कहा नहीं जा सकता, किन्तु हाँ इसका प्रतिफल किसी न किसी रूप में मिलता ही है।

वास्तव में मांसाहार-हिंसा, लोभ-लालच, ईर्ष्या-द्वेष, के साथ ही कुत्सित कामवासना की तरंगे धूल की तरह उड़ती हैं और कमजोर मानसिक अवस्था में शरीर के स्वास्थ्य को प्रभावित करती रहती हैं।

स्वस्थ रहने के लिए हमें मन को स्वच्छ बनाने की जिज्ञासा तीव्र करनी होगी, अपनी आस्था और दृष्टिकोण उस तरफ ले जाने की जरूरत है जहाँ लोग स्वर्ग जैसे माहौल में अपनी खान-पान और रहन-सहन को बनाकर जीवन का आनन्द ले रहे हैं।

महापुरुषों की वाणी है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य ज्ञान नहीं प्रेम का आदान-प्रदान है और इसी के लिए इस जीवन की प्राप्ति हुई है।

जीवन की सार्थकता : 

      जीवन की सार्थकता का एकमात्र लक्ष्य है -

आत्म ज्ञान की प्राप्ति। लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति का एक शर्त है - पूर्ण रूप से स्वस्थ रहना मतलब 'आरोग्यता' इसे पुरुषार्थ भी कहा जाता है। इसकी प्राप्ति इंसान को किसी समर्थ सद्गुरु के सानिध्य में रहते हुए, सेवा कार्यों में व्यस्त होकर उनकी कृपा से मिल जाया करती है। यह स्वमेव ही मिल जाती है, इसके लिए किसी प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती। खुद में निहित इस शक्ति से आजीवन ही अनभिज्ञ बने रहते हैं - यह उसी गुरु परमात्मा की एक और महती कृपा ही है, जिससे अहंकार पनपने न पाये।


रामाश्रम सत्संग मथुरा जिसके संस्थापक (1930) समर्थ गुरु परम संत डॉ. चतुर्भुज सहाय जी हैं, मैंने पूरी आस्था और विश्वास के साथ जुड़ कर समर्पित होकर अपने जीवन लक्ष्यों से सामीप्यता हासिल की। इस ब्लॉग लेख के माध्यम से मैं सार्वजनिक मंच से उनकी कृतज्ञता का इज़हार कर गौरवान्वित हो रहा हूँ ।

हमारे पूज्य गुरु महाराज जी का फोटो इस ब्लॉग का मुख्य पृष्ठ है। 

- विजय कश्यप

लेखक : द हेल्थ जनरल

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