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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड

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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड ​ आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खान-पान की अनियंत्रित आदतों के कारण पथरी (Stone) एक आम स्वास्थ्य समस्या बन गई है। किडनी, पित्त की थैली (Gall Bladder) या मूत्र मार्ग में होने वाली यह समस्या असहनीय दर्द का कारण बनती है। यदि आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो केवल दवा ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सही खान-पान और सख्त परहेज का पालन करना भी अनिवार्य है। आज के इस लेख में हम होम्योपैथिक दृष्टिकोण और आहार संबंधी आवश्यक सावधानियों पर चर्चा करेंगे। ​ पथरी होने के लक्षण और पहली सावधानी ​ पथरी होने का मुख्य संकेत किडनी के आसपास होने वाला तीव्र दर्द है। यदि सोनोग्राफी या अल्ट्रासाउंड में पथरी की पुष्टि होती है, तो सबसे पहली सावधानी यह बरतें कि कैल्शियम (चूना) का सेवन पूरी तरह बंद कर दें । शरीर में कैल्शियम का सही ढंग से न पचना ही स्टोन बनने का सबसे बड़ा कारण है। ​ पथरी को गलाने के लिए होम्योपैथिक उपाय ​ होम्योपैथी में पथरी को धीरे-धीरे घोलकर बाहर निकालने के लिए दो प्रभावी औषधियाँ सुझाई जाती हैं: ​ बर्बेरिस वल्गेरिस (Berberis Vulgar...

मानसिक और आध्यात्मिक बल: समर्थ गुरु की कृपा से जीवन का रूपांतरण


मानसिक और आध्यात्मिक
बल: समर्थ गुरु की कृपा से जीवन का रूपांतरण

जीवन की यात्रा में हम अक्सर शारीरिक शक्ति को ही सर्वोपरि मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में जीवन को सही दिशा और समाज में प्रतिष्ठा दिलाने वाली शक्ति हमारे भीतर छिपी होती है—वह है मन की शक्ति। आइए गहराई से समझें कि यह मन कैसे शक्तिशाली बनता है और इसमें एक 'गुरु' की क्या भूमिका होती है।

​मन की सहनशीलता और मर्यादित आचरण का महत्व:

​जिस प्रकार हमारा शरीर विभिन्न परिस्थितियों, मौसम के थपेड़ों और वातावरण के कष्टों को सहन करते-करते मजबूत और शक्तिशाली बनता है, ठीक उसी प्रकार हमारा मन भी विपरीत परिस्थितियों में तपकर बलवान होता है।

​पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियाँ:

​जब मनुष्य पारिवारिक उलझनों, सामाजिक उतार-चढ़ाव और सार्वभौमिक परिस्थितियों में खुद को मर्यादित रखता है, तो उसके भीतर एक अद्भुत संयम का जन्म होता है।

​अनुकरणीय आचरण: सच्ची प्रतिष्ठा का आधार

​मर्यादित रहकर जब कोई व्यक्ति एक उत्कृष्ट और अनुकरणीय आचरण अपनाता है, तो उसका आंतरिक आत्मबल कई गुना बढ़ जाता है। यह मानसिक और नैतिक शक्ति किसी भी शारीरिक शक्ति की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। यही वह बल है जो मनुष्य को समाज में वास्तविक सम्मान, प्रतिष्ठा और अक्षुण्ण ख्याति दिलाता है।

​गुरु की आवश्यकता और आध्यात्मिक गुरु का सर्वोच्च स्थान

​मजेदार बात यह है कि यह मन अकेले अपने बूते इतना शक्तिमान नहीं बन सकता। इसे हमेशा एक ऐसे मार्गदर्शक, एक ऐसे सहारे की आवश्यकता होती है जो इसकी ऊर्जा को सही दिशा दे सके। इसी मार्गदर्शक को हम "गुरु" के रूप में जानते हैं।

​आध्यात्मिक गुरु: जीवन की सर्वोच्च पायदान

​गुरुओं की इस शृंखला में जब हम सबसे ऊंचे पायदान पर पहुँचने की कोशिश करते हैं, तो हमें "आध्यात्मिक गुरु" की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक गुरु केवल सांसारिक ज्ञान नहीं देते, बल्कि वे हमारे भीतर के अंधकार को मिटाकर आत्मा का साक्षात्कार कराते हैं।

​श्रद्धा, विश्वास और शक्तियों का हस्तांतरण:

जब हम अपनी पूरी सामर्थ्य, औकात और हैसियत से किसी महापुरुष के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और विश्वास प्रकट करते हैं, तो चमत्कार घटित होने लगता है। उनके संपर्क में आते ही, उनकी असीम दया से उनके भीतर निहित दिव्य शक्तियां धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरने लगती हैं।

​तदरूपता: गुरु-शिष्य का पूर्ण मिलन

​इतिहास गवाह है कि इस धरा पर जितने भी महान पुरुष आए, उनके जीवन में आदर्श के रूप में कोई न कोई गुरु अवश्य रहा। जब तक गुरु से यह आंतरिक जुड़ाव रहता है, तब तक दिव्य शक्तियों का प्रवाह लगातार बना रहता है। और फिर एक दिन, जब गुरु की विशेष कृपा होती है, तो वे अपनी संपूर्ण शक्तियां शिष्य को सौंप देते हैं। इस अवस्था में शिष्य अपने गुरु से पूर्ण 'तदरूपता' (एकता) को प्राप्त कर लेता है।

​एक मनोचिकित्सक के रूप में आध्यात्मिक गुरु:

​आज के दौर में जिसे हम मानसिक तनाव या अवसाद कहते हैं, हमारे आध्यात्मिक गुरु सदियों से उसका इलाज करते आ रहे हैं। ये गुरु हमारे जीवन में एक कुशल मनोचिकित्सक (Psychiatrist) की भूमिका निभाते हैं।
  • अंग-संग रहना: वे हर पल अदृश्य रूप से हमारे साथ रहकर हमारे विचारों को शुद्ध करते हैं।
  • जीवन-धारा का बदलना: वे हमारे सोचने, जीने और कर्म करने के नजरिए को बदलकर हमारी पूरी जीवन-धारा को एक सकारात्मक मोड़ दे देते हैं।

समर्थ गुरु परम संत डॉ. चतुर्भुज सहाय जी और रामाश्रम सत्संग, मथुरा:

​भारत भूमि हमेशा से संतों और आध्यात्मिक गुरुओं की धरा रही है। यहाँ दिव्य विभूतियों की कभी कोई कमी नहीं रही। ऐसे ही एक महान और समर्थ आध्यात्मिक गुरु हुए—परम संत डॉ. चतुर्भुज सहाय जी महाराज

रामाश्रम सत्संग, मथुरा की स्थापना:

​डॉ. चतुर्भुज सहाय जी महाराज ने अपने पूज्य गुरु श्री रामचंद्र जी महाराज की आज्ञा और अनुमति से "रामाश्रम सत्संग मथुरा" की स्थापना की। आज यह संस्थान लाखों-करोड़ों जिज्ञासुओं के लिए आत्म-कल्याण का एक पावन केंद्र है, जहाँ से जुड़कर लोग आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं और अपने मानव जीवन को धन्य बना रहे हैं

लेखक का सौभाग्य और सेवा भाव:

यह इस ब्लॉग के लेखक का परम सौभाग्य और गौरव है कि वह भी इस पावन 'रामाश्रम सत्संग मथुरा' और गुरुसत्ता से जुड़ा हुआ है। आज ब्लॉग के माध्यम से आप तक जो भी विचार पहुँच रहे हैं, लेखक इन्हें अपने गुरु महाराज का आशीर्वाद और प्रसाद समझकर, विशुद्ध 'सेवा की भावना' से आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा है।

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निष्कर्ष:

निष्कर्षतः, शारीरिक बल की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन गुरु की कृपा से प्राप्त आध्यात्मिक और मानसिक बल असीम है। एक समर्थ गुरु हमारे जीवन में आकर न केवल हमारे मन के विकारों को दूर करते हैं, बल्कि हमें अपनी ही शक्तियों से सराबोर कर देते हैं। रामाश्रम सत्संग मथुरा जैसी पवित्र संस्थाएं और डॉ. चतुर्भुज सहाय जी महाराज जैसे संत इसी गुरु-कृपा के साक्षात प्रतीक हैं। यदि हम भी सच्चे मन और श्रद्धा से गुरु चरणों में खुद को समर्पित कर दें, तो हमारा जीवन भी तदरूपता और परम आनंद को प्राप्त कर सकता है। मेरे गुरुवर की कृपा मुझ पर और मुझसे जुड़े सभी जनों पर सदा बनी रहे। 

लेखक : विजय कुमार कश्यप 

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