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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड

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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड ​ आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खान-पान की अनियंत्रित आदतों के कारण पथरी (Stone) एक आम स्वास्थ्य समस्या बन गई है। किडनी, पित्त की थैली ( Gall Bladder ) या मूत्र मार्ग में होने वाली यह समस्या असहनीय दर्द का कारण बनती है। यदि आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो केवल दवा ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सही खान-पान और सख्त परहेज का पालन करना भी अनिवार्य है। आज के इस लेख में हम होम्योपैथिक दृष्टिकोण और आहार संबंधी आवश्यक सावधानियों पर चर्चा करेंगे। ​ पथरी होने के लक्षण और पहली सावधानी ​ पथरी होने का मुख्य संकेत किडनी के आसपास होने वाला तीव्र दर्द है। यदि सोनोग्राफी या अल्ट्रासाउंड में पथरी की पुष्टि होती है, तो सबसे पहली सावधानी यह बरतें कि कैल्शियम (चूना) का सेवन पूरी तरह बंद कर दें । शरीर में कैल्शियम का सही ढंग से न पचना ही स्टोन बनने का सबसे बड़ा कारण है। ​ पथरी को गलाने के लिए होम्योपैथिक उपाय ​ होम्योपैथी में पथरी को धीरे-धीरे घोलकर बाहर निकालने के लिए दो प्रभावी औषधियाँ सुझाई जाती हैं: ​ बर्बेरिस वल्गेरिस (Berberis Vulg...

शरीर का पोषण भोजन से, न कि दवाओं से : जीवनशैली ही सबसे बड़ी औषधि है



शरीर का पोषण भोजन से, न कि दवाओं से : जीवनशैली ही सबसे बड़ी औषधि है

आज के दौर में अधिकांश लोग छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं में भी दवाओं का सहारा लेने लगे हैं। बुखार, सिरदर्द, थकावट, अपच – इन सभी के लिए सबसे पहले केमिकल युक्त एलोपैथिक दवाएं गटक लेना अब आम आदत बन चुकी है। लेकिन क्या वास्तव में हमारा शरीर दवा से स्वस्थ होता है या भोजन से? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।


भोजन ही सबसे बड़ा पोषण स्रोत :

हमारे शरीर का मूल पोषण भोजन से ही होता है – यह एक अटल सत्य है। अनाज, फल, सब्जियां, दालें, बीज, मसाले, और प्राकृतिक पेय – यही हमारे शरीर को वह ऊर्जा और पोषण देते हैं जिससे हमारा संपूर्ण तंत्र सुचारू रूप से चलता है। शरीर के हर अंग, हर कोशिका को जीवित और क्रियाशील बनाए रखने के लिए संतुलित भोजन की ही आवश्यकता होती है।


एलोपैथिक दवाओं से सावधानी जरूरी :

एलोपैथी ने आपातकालीन चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति लाई है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन सामान्य जीवन में हर छोटी परेशानी के लिए केमिकल दवाओं का इनटेक शरीर की जैविक प्रणाली (biological system) को बिगाड़ देता है। इन दवाओं से तत्काल राहत तो मिलती है, लेकिन ये शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देती हैं।

कभी-कभी एक दवा के साइड इफेक्ट को रोकने के लिए दूसरी दवा दी जाती है, और फिर वह दूसरी दवा शरीर पर नए दुष्प्रभाव छोड़ती है। यह चक्र लंबा चलता है और धीरे-धीरे शरीर एक दवा-निर्भर मशीन बन जाता है।


जीवनशैली में सुधार ही प्राथमिक उपाय हो :

हमारा पहला प्रयास यह होना चाहिए कि हम अपनी जीवनशैली को सुधारे – समय पर सोना, जागना, शांत चित्त से रहना, तनाव को दूर रखना, प्राणायाम और हल्के व्यायाम को दिनचर्या में शामिल करना, और सबसे बढ़कर, संयम रखना। ये सब उपाय शरीर को ऐसी स्थिति में रखते हैं जहां बीमारियां पनप ही नहीं सकतीं।


फिर सुधारें खान-पान :

हम जो भी खाएं, वह पोषण से भरपूर हो। भोजन का समय तय हो, वह पकाया हुआ हो, ताजा हो और बिना मिलावट के हो। फास्ट फूड, डिब्बाबंद चीजें, रंग-बिरंगे पेय और अधिक चीनी-नमक से भरपूर चीजें – ये सभी शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। खाना ऐसा होना चाहिए जो पेट भरने के साथ-साथ दवा जैसा लाभ भी दे।


आयुर्वेद : अमृत नहीं, पर संतुलित उपाय

आयुर्वेद को "अमृत" मानना भी एक अतिशयोक्ति है। आयुर्वेद में भी अनेक असरकारी औषधियाँ हैं, जिनमें से कई का दीर्घकालीन और अनुचित प्रयोग शरीर को हानि पहुंचा सकता है। रस-रसायन, धातु-युक्त औषधियाँ, और शक्तिवर्धक टॉनिक भी सीमित समय तक ही लाभकारी होते हैं। अतः आयुर्वेद का भी प्रयोग सोच-समझकर और विशेषज्ञ की सलाह से करें।


अपने शरीर के पहले डॉक्टर स्वयं बनें 

प्राकृतिक चिकित्सा की शुरुआत स्व-निरीक्षण से होती है। अपने शरीर के संकेतों को पहचानें – थकावट क्यों हो रही है, नींद क्यों नहीं आ रही, पाचन क्यों बिगड़ा है। हल्की बीमारी को सहने की शक्ति रखें। यही सहनशक्ति धीरे-धीरे इम्यूनिटी में बदलती है। छोटी-छोटी परेशानियों पर दवा न लें, बल्कि अपने आहार और जीवनशैली को जांचें।


निष्कर्ष : मिलावटी भोजन, हानिकारक स्वाद और रोगों का चक्र

आज जो भोजन हम कर रहे हैं, उसमें मिलावट आम बात हो चुकी है – दूध में डिटर्जेंट, घी में सिंथेटिक खुशबू, सब्जियों में रासायनिक रंग और फलों में कृत्रिम मिठास। इन सबका शरीर पर प्रत्यक्ष नहीं, पर अप्रत्यक्ष रूप से गहरा असर होता है। स्वाद के कारण हम इन हानिकारक रसायनों को लगातार ग्रहण कर रहे हैं।

इसीलिए अब समय है सतर्क होने का.. 

योगासन, प्राणायाम, हल्का व्यायाम, संतुलित और सात्विक भोजन – यही दीर्घायु और स्वस्थ जीवन का मंत्र है।

दवा नहीं, "गुणवत्ता से भरपूर आहार ही असली उपचार है।"

स्वस्थ रहिए, सजग रहिए।

लेखक : विजय कुमार कश्यप 


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