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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड

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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड ​ आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खान-पान की अनियंत्रित आदतों के कारण पथरी (Stone) एक आम स्वास्थ्य समस्या बन गई है। किडनी, पित्त की थैली ( Gall Bladder ) या मूत्र मार्ग में होने वाली यह समस्या असहनीय दर्द का कारण बनती है। यदि आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो केवल दवा ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सही खान-पान और सख्त परहेज का पालन करना भी अनिवार्य है। आज के इस लेख में हम होम्योपैथिक दृष्टिकोण और आहार संबंधी आवश्यक सावधानियों पर चर्चा करेंगे। ​ पथरी होने के लक्षण और पहली सावधानी ​ पथरी होने का मुख्य संकेत किडनी के आसपास होने वाला तीव्र दर्द है। यदि सोनोग्राफी या अल्ट्रासाउंड में पथरी की पुष्टि होती है, तो सबसे पहली सावधानी यह बरतें कि कैल्शियम (चूना) का सेवन पूरी तरह बंद कर दें । शरीर में कैल्शियम का सही ढंग से न पचना ही स्टोन बनने का सबसे बड़ा कारण है। ​ पथरी को गलाने के लिए होम्योपैथिक उपाय ​ होम्योपैथी में पथरी को धीरे-धीरे घोलकर बाहर निकालने के लिए दो प्रभावी औषधियाँ सुझाई जाती हैं: ​ बर्बेरिस वल्गेरिस (Berberis Vulg...

अंतः और बाह्य कुंभक प्राणायाम : फायदे गहन और अनेक


अंतः और बाह्य कुंभक का संयोजन: फायदे गहन और अनेक 

जब अंतः कुंभक (श्वास को अंदर रोकना) और बाह्य कुंभक (श्वास को बाहर रोकना) का अभ्यास एक साथ, संतुलित तरीके से किया जाता है, तो इसके लाभ व्यक्तिगत रूप से किए गए कुंभक से कहीं अधिक गहरे और व्यापक होते हैं। यह संयोजन शरीर, मन और ऊर्जा तंत्र पर अद्वितीय प्रभाव डालता है।

इस शक्तिशाली संयोजन के प्रमुख लाभ:

 * प्राण ऊर्जा का गहन नियंत्रण और संतुलन:

   * अंतः कुंभक शरीर में प्राण (जीवन शक्ति) को अंदर खींचता है और उसे वितरित करता है।

   * बाह्य कुंभक प्राण को शरीर के अंदर स्थिर करता है और अपान (नीचे की ओर बहने वाली ऊर्जा) को नियंत्रित करता है, जिससे शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।

   * दोनों के एक साथ अभ्यास से प्राण और अपान का मेल होता है, जिसे योग में ऊर्जा के उच्च स्तर को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यह शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित और नियंत्रित करता है, जिससे जीवन शक्ति बढ़ती है।

 * तंत्रिका तंत्र का सुदृढीकरण और शांति:

   * श्वास को रोकना तंत्रिका तंत्र पर गहरा प्रभाव डालता है। यह पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र (जो आराम और पाचन के लिए जिम्मेदार है) को सक्रिय करता है।

   * यह मन को शांत करता है, तनाव और चिंता को कम करता है, और गहरी आंतरिक शांति की भावना लाता है

 * फेफड़ों की क्षमता और श्वसन दक्षता में वृद्धि:

   * नियमित अभ्यास से फेफड़ों की कार्यक्षमता और लचीलापन बढ़ता है।

   * यह फेफड़ों को अधिक ऑक्सीजन अवशोषित करने और कार्बन डाइऑक्साइड को अधिक कुशलता से बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे श्वसन प्रणाली मजबूत होती है।

 * पाचन अग्नि और चयापचय में सुधार:

   * कुंभक के दौरान आंतरिक अंगों पर पड़ने वाला दबाव और ऊर्जा का स्थिरीकरण पाचन अग्नि (जठराग्नि) को उत्तेजित करता है।

   * यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है, पोषक तत्वों के अवशोषण में सुधार करता है और चयापचय को बढ़ावा देता है।

 * मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता में वृद्धि:

   * श्वास के ठहराव से मन शांत होता है और बाहरी विकर्षण कम होते हैं।

   * यह ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाता है, मानसिक स्पष्टता लाता है और स्मरण शक्ति में सुधार करता है।

 * आध्यात्मिक विकास और ध्यान की गहराई:

   * योगिक परंपराओं में, कुंभक को ध्यान और कुंडलिनी जागरण के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण माना गया है।

   * यह मन को भीतर की ओर मोड़ता है, जिससे ध्यान की स्थिति गहरी होती है और आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर करता है।

 * इच्छा शक्ति और आत्म-नियंत्रण का विकास:

   * श्वास को नियंत्रित करने का कार्य स्वयं पर नियंत्रण सिखाता है। यह मानसिक अनुशासन और दृढ़ता को बढ़ाता है, जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सहायक होता है।

कब, कैसे और कितनी देर करें?

कब करें:

 * सुबह का समय सर्वोत्तम है: सूर्योदय से पहले या उसके तुरंत बाद, जब वातावरण शांत और शुद्ध होता है। खाली पेट अभ्यास करना चाहिए।

 * शाम को भी संभव है: यदि सुबह संभव न हो, तो शाम को भोजन के कम से कम 3-4 घंटे बाद अभ्यास कर सकते हैं।

कैसे करें...? :

 * आसन: किसी आरामदायक ध्यान मुद्रा में बैठें (जैसे पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन)। रीढ़ सीधी, कंधे ढीले और आंखें बंद।

 * गहरी श्वास लें: धीरे-धीरे और पूरी तरह से श्वास अंदर भरें (लगभग 4-6 सेकंड)।

 * अंतः कुंभक: श्वास को अंदर रोककर रखें (लगभग 8-12 सेकंड, अपनी क्षमतानुसार)।

 * पूरी तरह श्वास बाहर निकालें: धीरे-धीरे और पूरी तरह से श्वास बाहर छोड़ें (लगभग 6-8 सेकंड)।

 * बाह्य कुंभक: श्वास को बाहर रोककर रखें (लगभग 8-12 सेकंड, अपनी क्षमतानुसार)। इस दौरान पेट को अंदर खींचें।

 * पुनरावृत्ति: यह एक चक्र पूरा हुआ। कुछ सामान्य सांसें लें और अगले चक्र के लिए तैयार हों।

कितनी देर और कितने चक्र:

 * अनुपात: योगिक ग्रंथों में श्वास लेने, अंतः कुंभक, श्वास छोड़ने और बाह्य कुंभक के लिए 1:4:2:4 का अनुपात बताया गया है। शुरुआती अभ्यासकर्ता अपनी सहजता के अनुसार इस अनुपात को समायोजित कर सकते हैं (उदाहरण के लिए 4:8:6:8 सेकंड)।

 * शुरुआत में: 3-5 चक्रों से शुरू करें।

 * धीरे-धीरे बढ़ाएं: समय के साथ आप चक्रों की संख्या 7-10 तक बढ़ा सकते हैं। महत्वपूर्ण है कि जबरदस्ती न करें और शरीर की सुनें।

अपेक्षित परिणाम कब मिलेंगे?

प्राणायाम के परिणाम व्यक्तिगत होते हैं और अभ्यास की नियमितता, सही तकनीक तथा शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करते हैं।

 * प्रारंभिक लाभ (कुछ सप्ताह में): आप तनाव में कमी, मन की शांति, बेहतर नींद, और ऊर्जा स्तर में कुछ सुधार महसूस कर सकते हैं।

 * मध्यमकालिक लाभ (कुछ महीने में): श्वसन क्षमता में स्पष्ट सुधार, बेहतर पाचन, बढ़ी हुई एकाग्रता और भावनात्मक स्थिरता का अनुभव हो सकता है।

 * दीर्घकालिक लाभ (छह महीने या अधिक): नियमित और सही अभ्यास से शारीरिक स्वास्थ्य में स्थायी सुधार, गहरी मानसिक स्पष्टता, और आध्यात्मिक विकास की दिशा में प्रगति देखी जा सकती है।

अत्यंत महत्वपूर्ण : निष्कर्ष 

कुंभक प्राणायाम एक शक्तिशाली क्रिया है।  इसे किसी अनुभवी योग गुरु के  मार्गदर्शन के शुरू करना चाहिए, खासकर यदि आपको कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो। गलत तरीके से अभ्यास करने से बचें।


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