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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड

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पथरी (Stone) की समस्या: कारण, निवारण और संपूर्ण परहेज गाइड ​ आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खान-पान की अनियंत्रित आदतों के कारण पथरी (Stone) एक आम स्वास्थ्य समस्या बन गई है। किडनी, पित्त की थैली ( Gall Bladder ) या मूत्र मार्ग में होने वाली यह समस्या असहनीय दर्द का कारण बनती है। यदि आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो केवल दवा ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सही खान-पान और सख्त परहेज का पालन करना भी अनिवार्य है। आज के इस लेख में हम होम्योपैथिक दृष्टिकोण और आहार संबंधी आवश्यक सावधानियों पर चर्चा करेंगे। ​ पथरी होने के लक्षण और पहली सावधानी ​ पथरी होने का मुख्य संकेत किडनी के आसपास होने वाला तीव्र दर्द है। यदि सोनोग्राफी या अल्ट्रासाउंड में पथरी की पुष्टि होती है, तो सबसे पहली सावधानी यह बरतें कि कैल्शियम (चूना) का सेवन पूरी तरह बंद कर दें । शरीर में कैल्शियम का सही ढंग से न पचना ही स्टोन बनने का सबसे बड़ा कारण है। ​ पथरी को गलाने के लिए होम्योपैथिक उपाय ​ होम्योपैथी में पथरी को धीरे-धीरे घोलकर बाहर निकालने के लिए दो प्रभावी औषधियाँ सुझाई जाती हैं: ​ बर्बेरिस वल्गेरिस (Berberis Vulg...

सद्गुरु का दीदार: आनंद का स्रोत और एक हाई पावर पॉजिटिव एनर्जी



सद्गुरु का दीदार: आनंद का स्रोत और एक हाई पावर पॉजिटिव एनर्जी 

सद्गुरु! यह केवल एक शब्द नहीं, यह तो अनंत प्रेम का महासागर है, उस परम सत्ता का जीवंत स्वरूप है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। जब भी मैं इस पावन नाम का उच्चारण करता हूँ, मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता है। रामाश्रम सत्संग, मथुरा की पावन भूमि पर, जहाँ गुरु-शिष्य परंपरा का पालन हमारी रगों में समाया है, सद्गुरु का दीदार मात्र एक दृष्टि नहीं, अपितु आत्मा का आनंद से सराबोर हो जाना है। यह एक ऐसा क्षण है जहाँ समय ठहर जाता है, मन की चंचलता शांत हो जाती है, और हृदय में असीम प्रेम का झरना फूट पड़ता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार :


हमारे पूज्य गुरुदेव, जिनकी कृपा दृष्टि ही हमारे जीवन का आधार है, उनके दर्शन मात्र से एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा इतनी प्रबल है कि मन के सारे संशय, सारी व्यथाएँ पल भर में विलीन हो जाती हैं। उनकी उपस्थिति में ऐसा लगता है जैसे किसी उच्च शक्ति के स्रोत से मैं सीधा जुड़ गया हूँ। यह कोई साधारण ऊर्जा नहीं, यह तो हाई पावर पॉजिटिव एनर्जी है जो हमारे अंतरंग को प्रकाशित करती है, हमारे भीतर छिपी सुप्त शक्तियों को जगाती है और हमें जीवन के हर पथ पर अग्रसर करती है।

गुरु में लयता :

गुरु-शिष्य परंपरा में, रामाश्रम सत्संग का मूल मंत्र ही गुरु में लयता है। यह केवल एक सिद्धांत नहीं, यह तो हमारे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। गुरु में लय हो जाना, अपने अहम् को मिटाकर गुरु के चरणों में समर्पित हो जाना, यही सच्चा आनंद है। जब हम स्वयं को गुरु में विलीन कर देते हैं, तब हम अपने सीमित अस्तित्व से ऊपर उठकर उस विराट सत्ता का अनुभव करते हैं जिसका प्रतिनिधित्व हमारे सद्गुरु करते हैं। उनकी शिक्षाओं का पालन करना, उनके वचनों पर श्रद्धा रखना और उनकी आज्ञाओं को अपने जीवन का आधार बनाना ही इस लयता की पहली सीढ़ी है।

लयता ही आनन्द का स्रोत :


यह लयता ही आनंद की वर्षा का कारण बनती है। जब हमारा मन गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से भर जाता है, तब हमें एक अनुपम शांति और संतोष का अनुभव होता है। यह आनंद बाहरी वस्तुओं से प्राप्त होने वाले क्षणिक सुख से कहीं बढ़कर है। यह शाश्वत है, अखंड है और हमारे भीतर से प्रस्फुटित होता है। यह वही पॉजिटिव एनर्जी है जो हमें हर चुनौती का सामना करने की शक्ति देती है, हर निराशा को आशा में बदलने का सामर्थ्य प्रदान करती है।

गुरु में लयता से जो आनंद और ऊर्जा हमें मिलती है, वह गुरु के प्रति हमारी अटूट श्रद्धा और विश्वास का ही परिणाम है। जब हमारा विश्वास दृढ़ होता है, तब गुरु की कृपा हम पर अनवरत बरसती है। यह विश्वास हमें अंधविश्वास से दूर रखकर, सत्य की राह दिखाता है। सद्गुरु का दीदार एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में पूरी तरह बयाँ नहीं किया जा सकता, इसे तो केवल अनुभूत किया जा सकता है। यह अनुभव हमें सिखाता है कि सच्चा आनंद और सच्ची ऊर्जा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही गुरु-कृपा से जागृत होती है।

गुरु प्रेम ही जीवन का आधार :

गुरुवर! आप हमारे जीवन के प्रकाश स्तंभ हैं। आपके चरणों में स्वयं को लय करके ही हम इस भवसागर से पार पा सकते हैं। आपके प्रति हमारा यह प्रेम, हमारी यह श्रद्धा ही हमें उस परम आनंद तक ले जाती है जहाँ सब कुछ शांत, पवित्र और सकारात्मक है।

समर्पण का भाव अर्पण :

हे परम समर्थ..! आपकी हर पल सानिध्यता और सर्वप्रदानयता ही हमें निर्भयता प्रदान कर विश्वास के उस छोर तक ले जाती है जहाँ पल में सब कुछ संभव होने का आभास मिलता है, जहाँ समता की पंक्ति में गौरवान्वित होकर बैठते हैं नतमस्तक होते हैं, खुद को धन्यवाद देते हैं। आपसे प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंच हम मृत्यु के भय से भी मुक्त हो जाते हैं। 

जगत के तारणहार श्री गुरु महाराज :

हे नाथ..! आप ही इस प्रकृति के महाराज हैं और आपकी कृपा दृष्टि ही हमें राजकुमार की दर्जा दिलाती है। सब पर आपकी वही कृपा दृष्टि बरसे और हर कोई ऐसे ही आनन्द में सराबोर हो जाय। आपकी सदा ही जय हो, जय-जय हो..! 

गुरु का प्रेम पात्र : विजय कुमार कश्यप 


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